देशभर में किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विशेषज्ञों की टीमें मैदान में उतरेंगी
नई दिल्ली/पटना: देश में खेती की बढ़ती चुनौतियों के बीच अब मिट्टी की सेहत को बचाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में ‘खेत बचाओ अभियान’ की शुरुआत की गई है, जिसका उद्देश्य किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग के प्रति जागरूक करना है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में खेती की सबसे बड़ी समस्या केवल खाद की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसका असंतुलित और अत्यधिक उपयोग है। विशेष रूप से यूरिया के अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है, जिससे भविष्य में कृषि उत्पादन और पर्यावरण दोनों पर असर पड़ सकता है।
अभियान के तहत देशभर में कृषि विशेषज्ञों की 1,650 से अधिक टीमें गांव-गांव जाकर किसानों को जागरूक करेंगी। किसानों को बताया जाएगा कि अधिक उर्वरक डालने से उत्पादन बढ़ना जरूरी नहीं है, बल्कि इससे मिट्टी की गुणवत्ता और फसलों की दीर्घकालिक उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, फसलों के लिए नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटाश (K) का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। लेकिन कई राज्यों में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का उपयोग निर्धारित मानकों से काफी अधिक हो रहा है। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है और खेती की लागत भी बढ़ रही है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी परीक्षण, जैविक खाद, गोबर खाद और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन के साथ मिट्टी की सेहत भी बनाए रख सकते हैं।
बिहार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अभियान?
बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। ऐसे में मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता और वैज्ञानिक खेती से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ लागत भी कम की जा सकती है।
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खेती केवल आज की फसल नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी है। यदि मिट्टी की सेहत सुरक्षित रहेगी, तभी कृषि और किसान दोनों मजबूत रहेंगे। ‘खेत बचाओ अभियान’ किसानों को टिकाऊ और वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
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