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बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग, शिल्पकारों और बुनकरों में खुशी की लहर

Info Bihar | पटना

बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को एक और बड़ी पहचान मिली है। राज्य के तीन विशिष्ट उत्पादों — नालंदा की बावन बूटी वस्त्र कला, गया का पत्थर शिल्प (स्टोन क्राफ्ट) और भोजपुर की पिरोढ़ा पेंटिंग — को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि से राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों और लोक कलाकारों में उत्साह का माहौल है।

जीआई (Geographical Indication) टैग किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक पहचान को प्रमाणित करता है। इससे न केवल उत्पाद की मौलिकता सुरक्षित रहती है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उसकी अलग पहचान भी बनती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बिहार के पारंपरिक उद्योगों को नई ऊर्जा मिलेगी और स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।

क्या है बावन बूटी कला?

नालंदा जिले की प्रसिद्ध बावन बूटी बुनाई कला अपनी अनूठी डिजाइनों और पारंपरिक हस्तकला के लिए जानी जाती है। इस कला में कपड़ों पर 52 प्रकार की विशेष आकृतियां और प्रतीक उकेरे जाते हैं। वर्षों से यह कला बिहार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है। जीआई टैग मिलने से इस कला को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिलने की उम्मीद है।

गया का पत्थर शिल्प बना पहचान

गया का पत्थर शिल्प उद्योग अपने उत्कृष्ट हस्तनिर्मित उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर पत्थरों पर बारीक नक्काशी कर धार्मिक, सजावटी और उपयोगी वस्तुएं तैयार करते हैं। जीआई टैग मिलने से इस क्षेत्र के शिल्पकारों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलने का मार्ग प्रशस्त होगा।

भोजपुर की पिरोढ़ा पेंटिंग को भी मिली मान्यता

भोजपुर क्षेत्र की पारंपरिक पिरोढ़ा पेंटिंग लोक कला का एक अनूठा रूप है। यह कला स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक जीवन को रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान मिलने की संभावना बढ़ गई है।

मुख्यमंत्री ने दी बधाई

बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि राज्य की पारंपरिक कलाओं और हस्तशिल्प को नई पहचान मिलना बिहार के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि सरकार लोक कला, हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्योगों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार प्रयासरत है।

मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और बिहार के कारीगरों को रोजगार तथा आर्थिक मजबूती मिलेगी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ

विशेषज्ञों के अनुसार जीआई टैग केवल पहचान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह स्थानीय उत्पादों को नकली वस्तुओं से भी सुरक्षा प्रदान करता है। इससे उत्पादों की मांग बढ़ती है और कारीगरों को बेहतर आय प्राप्त होती है।

बिहार के इन तीन उत्पादों को जीआई टैग मिलने से हजारों शिल्पकारों, बुनकरों और कलाकारों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है। साथ ही राज्य की सांस्कृतिक विरासत को भी नई पहचान और संरक्षण मिलेगा।

निष्कर्ष

बिहार की कला, संस्कृति और हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा देशभर में अपनी अलग पहचान रखती है। नालंदा की बावन बूटी, गया का पत्थर शिल्प और भोजपुर की पिरोढ़ा पेंटिंग को जीआई टैग मिलना न केवल राज्य के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह स्थानीय कलाकारों और कारीगरों के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।