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एक बुजुर्ग जिनकी उम्र अब विश्राम की होनी चाहिए थी, वो आज भी गर्मी और धूप में मेहनत कर रहे हैं — शायद पेट की मजबूरी, या फिर अपनों की बेरुख़ी।जिस उम्र में उन्हें अपने बच्चों के साथ सुकून की छांव में बैठकर दो वक्त की रोटी खानी चाहिए थी,उसी उम्र में वो भीड़भाड़ में, धूल और पसीने के बीच दो रोटी कमाने को मजबूर हैं।हम एक ऐसा समाज बनाते जा रहे हैं जहां बच्चों के लिए “everything on demand” है,लेकिन माता-पिता के लिए “समय नहीं है।”📌 सोचिए… क्या हम अपने बच्चों के सामने वही मिसाल पेश कर रहे हैं, जो कल हमें भुगतनी पड़ेगी?🙏 माँ-बाप सिर्फ रोटी नहीं, सम्मान और अपनापन भी चाहते हैं।👣 चलिए मिलकर एक ऐसा समाज बनाएं जहां बुढ़ापा शर्म नहीं, गर्व हो।—🧡 अगर आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसा बुजुर्ग है — तो आज उनसे कुछ पल ज़रूर बात करें।💬 “कमेंट करके बताएं — क्या आपने कभी किसी अनजान बुजुर्ग की मदद की है?”📢 पोस्ट को शेयर करें ताकि ज़्यादा लोग इस सच्चाई से रूबरू हो सकें।